फिर सोचनें लगा कि क्या वजह हो सकती हैं इन युवतियों की इस सोच की? कहीं एकल परिवारों में रहनें का खामियाजा तो नहीं है यह सोच? शायद शहरी जिंदगी की आपाधापी में बच्चें दादा-दादी, ताऊ-ताई व चाचा-चाची के निरंतर मिलनें वाले प्यार-दूलार व उसके साथ व्यवहार के ज्ञान से वंचित हो रहे हैं । एकल परिवार का विचार और वह भी नौकरीपेशा मॉं-बाप हो तो आजकल की युवा पीढ़ी त्यौहार का अर्थ ही भूल गई हैं । ये भविष्य की माताएं अपनें बच्चों को क्या संस्कार देंगी ? लेकिन फिर उस लड़की के व्यवहार का ख्याल आया जो गोद में बच्चा लिए आई थी लेकिन व्यवहार में कितनी विनम्रता व संस्कार झलक रहे थे हालांकि उम्र दोनों की उम्र एक जैसी लग रही थी ।'
अच्छा, आप ही बताइयें कि क्या इन दोनों घटनाओं में लड़कियों के व्यवहार में कहीं से संस्कारों की झलक मिलती हैं ? क्या ऐसा ही व्यवहार आजकल के कुछेक युवकों में भी नहीं झलकता है ? क्या महिला सीट या आरक्षित सीट का यह अर्थ हैं कि उस पर बैठे किसी बुढ़े, अशक्त, बीमार व्यक्ति या बच्चें कों उठा दिया जाए, भले ही उसे कितनी भी परेशानी हो ? क्या आपकों लगता है कि हमारी युवा पीढ़ी त्यौहारों के वास्तविक रूप-रंग को भूलती जा रही है और उसे आधुनिकता के नाम पर बिगाड़ रही है ?
प्रश्न तो अनेक हैं । लेकिन सोचना हमें ही हैं कि क्यों नहीं हम अपनें बच्चों को त्यौहार, परिवार व रिश्तों के वास्तविक महत्व को समझातें ? क्यों हम उन्हें मनचाहा करनें की छूट देते-देते संस्कारहीन बना रहे हैं ? क्या इसके लिए व्यवहार की पाठशाला लगानी होगी ?
- अरविन्द पारीक